दुर्ग - क्या होता है ?

दुर्ग - क्या होता है ? :
 
क्या होता है -दुर्ग? किन किन भाँतियों के होते हैं यह ? महाराष्ट्र के साथ साथ देश भर में कितने दुर्ग होंगे ? कहाँ से शुरुवात की जाए और कैसे पहुँचा जाए इन तक ? क्या देखा जाए, कैसे निहारा जाए इनको ? कौनसा दुर्ग क्या ऐतिहासिक महत्व रखता है ? आज की तारीख में क्या स्थिति हो रखी है उनकी ? एक नहीं, कई सवाल उठते हैं मन में , और यदि इन सवालों का जवाब चाहिए तो इन दुर्गों को शुरुवात से समझना होगा, इनके निर्माण को समझना होगा , इनकी रचना को समझना होगा|
 
अधिकतम दुर्ग पश्चिम महाराष्ट्र स्थित सह्याद्री क्षेत्र में दिखाई पड़ते हैं| सोचने की बात है कि प्राचीन काल में किस विचार से इन दुर्गों का निर्माण पर्वतों और कोर कगारों में किया जाता होगा| शायद इस वजह से कि इन मानवनिर्मित या फिर प्राकृतिक रूप से दुर्गम जगहों पर से शत्रु की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके या समय आने पर आसानी से आक्रमण किया जा सके या फिर कभी शत्रु के आक्रमणों से खुद अपनी सुरक्षा की जा सके| यानि दुर्ग एक ऐसी जगह है जिसका का निर्माण इतिहास में अपने राज्य का अस्तित्व एवं महत्ता बनाये रखने हेतु, जटिल परिस्थितियों में निवास हेतु, व्यापार मार्गों पर निगरानी रखने हेतु या फिर राज्य के विविध स्थानों से संकलित करों के संग्रह हेतु किया गया हो|
 
दुर्गों के विविध प्रकार :
दुर्गों के विविध प्रकारों का वर्गीकरण उनके निर्माण स्थल अनुसार किया जाता है| प्रायः हमारी जानकारी दुर्ग के केवल तीन वर्गों तक ही सिमित है| पर्वत या पहाड़ों में स्थित गिरिदुर्ग, समुन्दर के किनारे या द्विपों पर बने जलदुर्ग, या फिर समतल प्रदेश या भूमि पर बने भू-दुर्ग|
वनों या काननों में बने वनदुर्ग, किसी गुफ़ा या खोह में बने कंदर दुर्ग, गिली मिट्टी, कीचड़ या दलदल में बने कर्दम दुर्ग के साथ साथ किसी गढ़ी या कोट के स्वरूप में बनी हुई इमारत भी दुर्गों का ही प्रकार मानी जाती है|
 
महाराष्ट्र राज्य का दुर्ग इतिहास :
महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहाँ विभिन्न राज्यों और प्रदेशों से आए विदेशीयों ने शासन किया है| इसी कारणवश यहाँ पर बने दुर्गों में विदेशीयों की निर्माण शैली का भी प्रभाव दिखता है| महाराष्ट्र में बने दुर्गों में अफ़्रीकी रचना शैली से लेकर यूरोपीय रचना शैली की छंवी भी प्रतिबिंबित दिखाई पड़ती हैं| लगभग दो हज़ार साल पूर्व सत्ताधारी सातवाहन राजवंशों से लेकर राष्ट्रकूट, चालुक्य, शिलाहार, यादव, कदंब, बहमनी, मुगल, दक्षिणी राजतन्त्र, मराठा, पेशवाई, नीग्रो, डच और पुर्तगालियों के साथ साथ अंग्रेज़ों के भी रचना शास्त्र की देन हैं यह दुर्ग|
 
दुर्ग के विभिन्न भाग :
दुर्ग का निर्माण अथवा निर्माण हेतु योग्य स्थान की खोज का काम बड़ी सावधानी से किया जाता था| गिरीदुर्ग की बात करें तो इसका विभाजन चार हिस्सों में होता है| घेरा, मेट, माची और गढ़ी ही किसी भी गिरीदुर्ग के मुख्य भाग माने जाते हैं| दुर्ग की तलहटी पर बनी बाहरी सीमा पर बंसा गाँव “घेरा” कहलाता है| दुर्ग की दीवारों के बाहर निचले पठार पर फैली खुली जगह को “मेट” कहा जाता है| यहाँ अक्सर दुर्ग की सीमाचौकियाँ हुआ करती थीं| उपरी पठार पर गढ़बंदी से सरंक्षित समतल/सपाट भूमि को माची (उपत्यिका) और पर्वतशिखा पर बसी सबसे सुरक्षित जगह को गढ़ी (अधित्यिका) या “बालेकिल्ला” कहते हैं|
 
 
दुर्ग पर स्थित विभिन्न जगहों के नाम :
दुर्ग पर बने प्रत्येक भवन या रचना निर्मिती का कोई खास नाम अवश्य होता है| विशेष रूप से बनी माची, प्राचीर (दुर्ग की दीवारें) या प्रवेशद्वार दुर्ग की महत्ता के कारक साबित होते हैं|
 
महादरवाज़ा (महाद्वार) :
 
दुर्ग में प्रवेश करने के लिए राजमार्ग पर बनाए गए मुख्य प्रवेश द्वार को महादरवाज़ा या महाद्वार कहते हैं| इन्हीं महाद्वारों की रक्षा हेतु जहाँ कुछ दुर्गों में गढ़गज या बुर्जों की रचना देखी जाती है वहीँ कहीं कहीं सुरक्षितता के उद्दयेश से दुर्ग में एक के बाद एक कई दरवाजे भी देखने मिलते हैं| प्रवेशद्वार के भीतरी ओर पहरेदारों के लिए बनी कोठरी को “देवडी” कहा जाता है|
 
नगाड़खाना :
 
दुर्ग के प्रवेश द्वार पर ही एक कोठरी नगाड़ों के लिए भी हुआ करती थी जिसे नगाड़खाना कहा जाता| दुर्ग के दरवाज़ों को खोलते और बंद करते समय सूचना के तौर पर अथवा किसी महत्वपूर्ण अवसर पर ख़ुशी मनाने के लिए यहाँ नगाड़े बजाए जाते थे|
 
तटबंदी :
दुर्ग में माची और गढ़ी के क्षेत्रों में पत्थरों की चिनाई से बनी गढ़गजों (बुर्ज) वाली मजबूत दीवारों को “तटबंदी” या “गढ़बंदी” या “दुर्ग-प्राचीर” कहा जाता है|
 
बुर्ज :
दुर्ग की गढ़बंदी की दीवारों के भीतर निश्चित दूरी पर बनी मीनारों को बुर्ज या गढ़गज कहा जाता है| इन मीनारों का आकार अर्ध-परिपत्र (अर्ध गोलाकार), त्रिभुजाकार, षटभुजाकार, या कमल की पंखुड़ियों के आकार में बनाया जाता और प्राय: गढ़ की सुरक्षा के लिए इनपर तोपें रखी जाती थीं|
 
ढालकाठी :
किसी बुर्ज या मीनार पर राज्य अथवा दुर्ग के मानचिन्ह/ ध्वज को लहराने के लिए बनाई गई खास जगह (चबूतरा) “ढालकाठी” कहलाती थी|
 
मुहाना (जंग्या) :
बुर्ज या मीनारों में खास तरीके से बनी नलीदार सुराखें या मुहाना जिनसे की बंदूक की गोलियाँ या फिर तीर चलाए जा सकें, इन्हें मुहाना(जंग्या) कहा जाता है|
 
कंगूरा ( चऱ्या ) :
कंगूरा गढ़बंदी की दीवारों या बुर्जों पर बनी पंखुड़ीयों या किसी खास आकार की पत्थर से बनी रचना है जिनके पीछे छुपकर दुश्मन पर गोलियाँ चलाई जा सकें| गढ़बंदी की दीवारों में ऐसी कई कंगूरों के लिए जगह होती थी|
 
फांजी :
दुर्ग की गढ़बंदी या प्राचीर पर पहरेदारों की गश्त के लिए बनी खास जगह /पगडंडी को फांजी कहा जाता है|
 
बारूद की कोठरी (दारूकोठार) :
दुर्ग की रक्षा के लिए लगने वाला गोलाबारूद बारूद की अलग कोठरी में रखा जाता| इन कोठरियों को दुर्ग पर बनी लोगों की बस्तियों से सुरक्षित दूरी जगह पर बनाया जाता|
 
घुड़साल / अस्तबल (पागा) :
दुर्ग पर घोड़ों को बांधे रखने के लिए बनाई गई खास जगह को घुड़साल (पागा) कहते हैं|
 
चोर दरवाज़ा :
किसी भी दुर्ग पर महा दरवाज़ा या महाद्वार के अलावा कुछ अन्य दरवाजे भी हुआ करते थे| गढ़बंदी की दीवारों में कुछ गुप्त दरवाज़ों का बखूबी से निर्माण किया जाता| ऐसे दरवाजे अक्सर मुश्किल चढ़ाई वाली जगहों या पगडंडियों पर खुलते| दुर्ग के हित में किए गए गोपनीय कार्यों के लिए इनका इस्तेमाल हुआ करता था|
 
पानी की टंकी / तालाब / कुआँ :
दुर्ग पर पानी का भंडार रखने के उद्देश्य से वहाँ पानी की टंकियों, तालाबों या कुओं का निर्माण किया गया था| इन तालाबों, कुओं और टंकियों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता|
 
राजमहल एवं दुसरे भवन :
दुर्ग पर रहने वाले कुछ अहम लोगों के लिए विशेष महलों, मंदिरों, कचहरियों और भवनों का निर्माण किया जाता था| कुछ दुर्गों पर बनी ऐसी इमारतों का इतिहास में अनन्यसाधारण महत्त्व है|
 
शस्त्रशाला / शस्त्रागार :
कवच, बख्तर या हथियारों को रखने की जगह शस्त्रागार कहलाती है| शस्त्रों के निर्माण एवं उन्हें तेज करने हेतु यहाँ कई शस्त्रकार और लुहार नियुक्त किए जाते थे|
 
कडेलोट का स्थल :
अपराधियों को अक्सर शिक्षा के रूप में दुर्ग से नीचे धकेल दिया जाता था| जिस जगह से उन्हें धकेला जाता उस कगार को कडेलोट का स्थल कहा जाता| यह प्रायः दुर्ग के पर्वत की बहार निकली हुई ऊँची चट्टान पर हुआ करता था|
 
 
शिवकालीन समय में / शिवाजीमहाराज के समय में किसी दुर्ग पर शाश्वत काल तक अधिपत्य रहने की संभावनाएँ कम ही होती थीं| इसी कारण कुछ चुनिंदा आवश्यक भवनों और इमारतों का ही निर्माण किया जाता था और अन्य अनावश्यक भवनों का निर्माण – समय , पूँजी और श्रम के आधार पर व्यर्थ ही समझा जाता| महाराष्ट्र में बने शिवाजी के इन दुर्गों का मुख्य उद्देश्य युद्ध और संग्राम में सुविधा हेतु बनाए गए थे इसीलिए इनपर आलीशान भवन या महल देखने नहीं मिलते| आमतौर पर लोग मिटटी या गोबर की दीवारों से बने छोटे छोटे घरों में रहा करते थे|
 
इन दुर्गों को समझने का, उनका अध्ययन करने का अपन एक अलग तंत्र है और दुर्गों का भ्रमण करते समय इस तंत्र को अपनाते हुए भ्रमण का आनंद लेना जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है| यदि आप इन दुर्गों के इतिहास की थोड़ी से भी जानकारी रखते हैं तो इनका भ्रमण, इनका सौंदर्य और इनमें छुपे अतीत को करीब से महसूस करने की संतुष्टि आपको अवश्य ही मिलेगी|