दुर्ग लोहगड
   
 
दुर्ग की ऊँचाई : समुद्र सतहसे १०३६ मीटर ऊपर
दुर्ग का स्थान : मुंबई-पुणे महामार्ग, मळवली, जि. पुणे, महाराष्ट्र.
दुर्ग का प्रकार : गिरीदुर्ग
 
 
 
 
लोहगडसे जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेख :
• साल १४६४ में बुरहान शाह द्वितीय लोहगड पर कैद में रखा गया था |
• साल १६४८ में शिवाजी महाराज ने लोहगड जीता|
 
लोहगड का नाम लेते ही आँखों के सामने छा जाता है हरियाली भरा इलाका – खास कर“विंचू काटा”| चाहे बरसातें हों या सर्दियों का मौसम – लोहगड पर हमेशा ही कोहरा छाया रहता है | पुणे - मुंबई महामार्ग पर लोनावला के पास स्थित यह एक गिरिदुर्ग है | यहाँ आस-पास देखने को मिलने वाली सह्याद्री के निसर्ग सौंदर्यकी अनुभूति अवर्णनीय है | मावळ क्षेत्र की पवना घाटी में “बोरघाट” का संरक्षक बन खड़ा लोहगड एक बहुत ही अच्छा पर्यटन स्थल है | छुट्टी वाले दिनों में यहाँ पुणे – मुंबई के दुर्गप्रेमियों का ताँता लगा रहता है | यदि आप लोकल ट्रेन से आ रहे हैं, तो मळवली रेल्वे स्टेशन पर उतरकर दुर्ग की तरफ जाया जा सकता है | विसापूर, तुंग और तिकोना के दुर्ग भी लोहगड के आस-पास के क्षेत्र में ही स्थित है | भगवान बुद्ध के समय से प्रसिद्ध “भाजे” तथा “बेडसे” की गुफाएँ भी इसी क्षेत्र में दिखाई पड़ती हैं | गड की तलहटी तक गाड़ी ले जाना संभव है | मळवली गाँव से लोहगड की ओर जाते समय रास्ते में “गायमुख” की घाटी पडती है | यहाँ से दाईं ओर है लोहगड और बाईं ओर है विसापूर | इसी रास्ते पर आगे चलकर लोहगडवाडी नामक गाँव दिखाई देता है | गड पर उपर जाने के लिए सीढियाँ बनी हुईं है | जैसे-जैसे हम इन सीढ़ियों से उपर चढ़ने लगते है, वैसे-वैसे लोहगड क्षेत्र का निसर्ग सौंदर्य और उजागर होता जाता है | 
 
लोहगड का इतिहास : लोहगड का निर्माण काल इतिहास में दर्ज नहीं है मगर इसकी अभेद्य फौलादी गढ़बंदीको देख कुछ अनुमान लगाया जा सकता है | दुर्ग की निर्मिती शायद “भाजे” तथा “बेडसे” की गुफाओं के बनने से पहले ही की गई होगी | लोहगड पर सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट तथा यादव शासकों का शास. रहा है | इ. स. १४८९ में जब मलिक अहमदशाह ने शिवनेरी पर निजामशाही स्थापित की तब उसने पुणे के आस-पास स्थित लगभग सभी दुर्गों को जीत लिया था | इसमें लोहगड भी शामिल था | इ. स. १६३० में लोहगड पर आदिलशाही की हुकुमत रही और आगे चलकर इ. स. १६५७ में शिवाजीमहाराज ने कल्याण और भिवंडी का क्षेत्र जीतते हुए लोहगड–विसापूर को भी स्वराज्य में शामिल कर लिया | इ. स. १६६५ में हुए ऐतिहासिक पुरंदर के समझौते के तहत लोहगड मुग़लों को सौंपा गया मगर फिर १६७० में मराठों ने इसपर पुनः विजय प्राप्त कर ली | शिवाजीमहाराज की सेना द्वारा की गई सूरत की पहली लूटकी सारी संपत्ति सेनापति नेतोजी पालकर ने लोहगड पर ही सुरक्षित रखी थी | आगे चलकर इ. स. १७१३ में शाहूमहाराज ने लोहगड कान्होजी आंग्रे को सौंपा और इ. स. १७२० के आगे इस पर पेशवाओं का हक़ रहा| १७८९ में नाना फडणवीस ने इसकी मरम्मत करवाई और इ. स. १८०३ में यह दुर्ग अंग्रेजों के अधिकार में चला गया |
 
दुर्ग पर देखने लायक जगहें : लोहगडवाडी से होकर दुर्ग पर जाते समय चार दरवाज़ों के बीच से होती हुई सर्पिली मोढदार राह से होकर गुजरना पड़ता है | बरसातों में यहाँ रुके हुए पानी और शैवाल की वजह से दुर्ग पर पहुँचना कुछ मुश्किल हो जाता है | 
गणेश दरवाजा : इस दरवाज़े के दोनों तरफ भगवान गणेश की मूर्तियाँ बनीं हैं | दरवाजे पर लोहे से बनी नुकीली कीलें लगीं हुईं हैं | दुर्ग की सुरक्षा हेतु यह गणेश दरवाज़ा अनन्य साधारण महत्व रखता है |
 
नारायण दरवाजा : पेशवाओं के राज्य में दुर्ग की मरम्मत करवाते समय यह दरवाज़ा नाना फडणवीस ने बनवाया था | इस दरवाज़े के पास अनाज के भंडार के लिए एक सुरंग जैसी कोठी भी बनी है | 
 
महादरवाजा : महादरवाजा लोहगड का मुख्य दरवाज़ा है | इसपर हनुमानजी की मूर्ति बनी हुई है | यहाँ से कुछ सीढियाँ चढ़कर फिर उपर गढ़ी की ओर जाना पड़ता है | यह दरवाज़ा भी नाना फडणवीस ने बनवाया था | महादरवाज़े से दुर्ग पर पहुँचते ही सामने एक मंदिर दिखाई पड़ता है | 
 
लोहगड पर स्थित एक मंदिर : गडपर कई वास्तुओंके भग्नावशेष देखने को मिलते हैं | इसी में एक टूटा हुआ मंदीर भी है | इतिहास कहता है की यह एक रजपूत सेनापति के पत्नी की समाधी है | यही पास में राजसदर भी है और मंदिर के ठीक बाहर चूने की भट्टी दिखाई देती है | भट्टी के पास ही एक ऊँचा ध्वज स्तंभ खड़ा है | इसके आगे चलकर हम लक्ष्मीकोठी तक पहुँचते हैं | लक्ष्मीकोठी के सामने ही एक टूटी फूटी तोंप पड़ी हुई है | कोठी में बने कमरे अपनी इस अवस्था में भी इतिहास की कहानियाँ उजागर करते हैं |
 
 
लक्ष्मीकोठी : लक्ष्मीकोठी एक बड़े से पत्थर में तराशी गई एक गुफा है | कहा जाता है कि यहाँ लोमेश ऋषी ने अपनी तपस्या पूर्ण की थी | लक्ष्मीकोठी को लोहगड की सबसे पुरातन वास्तुओं में से एक माना जाता है| बारिश के मौसम में यह कोठी पानी से भर जाती है मगर बाकी समय में गड पर रहने वाले पर्यटक अपना डेरा यहीं जमा लेते हैं |
 
बावनटाके : गडमाथे पर ४० से भी अधिक पानी की टंकियाँ बनी हैं जिसमें “बावनटाके” के नाम से जाने जानी वाली टंकी सबसे बड़ी मानी जाती है | इसका निर्माण नाना फडणवीस ने करवाया था | इस टंकी पर लगे शिलालेख में भी इस बात की पुष्टि की गई है |
 
विंचू काटा : गड पर एक लंबी मगर संकरी माची बनी हुई है जिसे “विंचू काटा” कहा जाता है | दूर से देखने पर यह बिच्छू के डंख जैसी दिखती है इसी कारण इसका नाम “विंचू काटा” (बिच्छू का डंख) पड़ा है| यह जगह पर्यटकों का मुख्य आकर्षण केंद्र है क्योंकि यहाँ से गड के परिसर में स्थित प्रदेश का पूरा क्षेत्र अधिक बेहतर और मनमोहक दिखाई देता है | इसकी कगार पर एक बुर्ज़ भी बना हुआ है |
 

 
 
देखा जाए तो लोहगड अपने निसर्ग सौंदर्य की वजह से पर्यटकों का आकर्षण केंद्र रहा है मगर यदि इसका इतिहास देखा और समझा जाए तो ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी यह दुर्ग उतना ही महत्त्व रखता है | दुर्ग प्रेमियों को यहाँ का इतिहास जानकर ही यहाँ जाने की कोशिश करनी चाहिए |