शिवाजी – एक निपुण नीति निर्माता
   

 

 

मानवी सभ्यता के शुरुवात ही से मनुष्य हमेशा ही समूहों या समुदायों में रहता आया है | अपनी-अपनी जनजातियों के साथ उसने हमेशा ही भूमि के टुकड़ों को आपस में बाँटा है और यही टुकड़े आगे चलकर उसके कुल को दर्शाते हुए प्रान्त, प्रदेश और देशों का रूप ले चुके हैं | जब भी कोई व्यक्ति अकेला रहता हो तो उसके लिए किन्हीं नियमों का होना आवश्यक नहीं, उसे अपने मन मुताबिक जीने की पूरी आज़ादी होती है| मगर किसी भी नियम का न होना शायद जंगल का नियम हो, मनुष्य की बस्ती का नहीं | जब भी कोई व्यक्ति अपने आप को किसी विशेष व्यक्ति समूह से , कबीले से या देश से जोड़ना चाहता है तो उसे उसके साथ आने वाले नियमों की सदस्यता भी लेनी पडती है| इन नियमों को क़ानूनी तौर पर “शासन” कहा जाता है | शासन – एक ऐसी प्रणाली जो लोगों की सुरक्षा और विकास के लिए काम करती है, और जो व्यक्ति के आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए उसके हित का ही विचार करती है|
 
भारत देश हमेशा सुशासन का पुरस्कार करता आया है और शायद यह नैतिक राजनीति “राम-राज्य” के काल ही से जनमानस का आदर्श रही है | मगर आज के नए युग में सुशासन मानो जैसे बस एक सपना लगता है | मगर ज्यादा पहले की बात नहीं, कुछ तीन सदियों पहले ही, शिवाजी महाराज के शासनकाल में भारत ने वास्तव में सुशासन का सबसे अच्छा उदाहरण देखा है |
 
किसी देश या संगठन के लिए बिना अच्छी नीतियों के अधर पर काम करना संभव नहीं | यह नीतियाँ एक तरह से जैसे व्यवहार का संविधान हैं जिसमें स्वीकार्य एवं अस्वीकार्य आचरण को परिभाषित किया गया है | राष्ट्र की प्रमुख गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए यह नीतियाँ निर्णयकर्ताओं का मार्ग स्पष्ट करने का काम करती हैं |
 
शिवाजी महाराज एक न्यायप्रिय एवं निष्पक्ष राजा थे जो सभी को समानता की दृष्टि से देखते थे | उनकी नीतियाँ अनुशासन की सीमाओं को लाँघे बिना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मान भी रखती हैं । उनकी सेना, वित्त तथा कर्मचारियों से सबंधित नीतियाँ “स्वराज” के सपने को वास्तव में लाने का उत्तम माध्यम थीं |
 
शिवाजी महाराज के शासनकाल से पूर्व किसी भी राज्य में सैनिकों की भर्ती थोड़े काल के लिए ठेके से की जाती थी | शिवाजी महाराज ऐसे पहले राजा थे जिन्होंने सैनिकों को नियमित वेतन के साथ स्थायी रूप से नौकरी पर रखा | सेना में ओहदों का क्रम जारी किया गया और उसी के अनुसार वेतन भी सुनिश्चित किया गया |
 
शिवाजी महाराज की कृषि संबंधी नीतियाँ पूरे देश में सराही गईं | उनके पास हर एक किसान का पूरा ब्यौरा दर्ज था जैसे – किसके पास किस तरह की भूमि उपलब्ध है , किस प्रकार की फसल है और किस तरीके की उपज, कौन कैसे सिंचाई कर रहा है, इन सारी बातों के अभिलेख उनके पास मौजूद थे |
 
उनकी कर संबंधी नीतियाँ भी अनोखी थीं| हर गाँव के तीन अधिकारी - देशपांडे, कुलकर्णी और पाटिल, सर्व सम्मति से कर का ढाँचा तैयार करते | कर इकठ्ठा करते समय राज्य की आवश्यकता, वित्तीय स्थिति और स्थानीय परंपराओं को ध्यान में रखा जाता । जोर जबरदस्ती या अवैध मार्ग से कर का संग्रह नहीं के बराबर था।
 
शिवाजी महाराज ने समाज से सामंतवाद को ही मिटा दिया| वतनदार या जमीनदार अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर की सोचते नहीं थे | शिवाजी नेमहाराज ने यह प्रथा समाप्त करने की कोशिश की और इन सामंतों को सेना में नियमित वेतन उच्च अधिकारिक पद दिया गया।
 
अपनी सेना में उन्होंने सभी जातियों और जनजातियों के सदस्यों को नियुक्त किया। मंत्रियों को अलग-अलग जिम्मेदारियाँ सौंपते हुए हर कार्यालय को वंश परंपरा से मुक्त किया | उन्होंने किलों के प्रशासन पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने राजस्व प्रशासन में "रयतवारी" प्रणाली की स्थापना की और राज्य ने किसानों के साथ सीधा संपर्क बनाए रखा।
 
उन्होंने मंत्रियों की केंद्रीय परिषद - अष्ट प्रधान मंडल की स्थापना की परंतु इस मंडल पर नियुक्ति सिर्फ और सिर्फ कार्य दक्षता के अधर पर हुआ करती थी | शिवाजी महाराज ने अपने राज्य में प्रांतीय प्रशासन को महत्व दिया । प्रत्येक प्रांत को कई जिलों और गांवों में विभाजित किया गया | हर गाँव का कार्य एक संगठित संस्था की तरह गाँव के पाटील की देख रेख में ग्राम पंचायत की मदद से चलने लगा |
 
शिवाजी महाराज की धार्मिक नीतियाँ उदारवादी थीं | उन्होंने सभी धर्मों और धार्मिक ग्रंथों का सम्मान किया | युद्ध के दौरान न ही कभी मस्जिदों को नष्ट किया गया था और न ही मुस्लिम महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार हुए| उनकी रक्षा हिंदुओं समान ही की गई थी। शिवाजीमहाराज की सेना और प्रशासन में मुसलमान नागरिकों को बराबर का हक मिलता रहा |
 
दिलचस्प बात यह है कि उनकी नीतियाँ बदलते समय के साथ प्रासंगिक रहीं| उनकी इन्हीं नीतियों की वजह से महाराज की मृत्यु के बाद भी "मराठा सामराज" प्रबल रहा | जिस प्रकार शिवाजी महाराज का स्वराज सपना, उनकी दृष्टि, उनके उद्देश्य और उनकी कार्यनीति उन्हें एक आधुनिक "प्रबंधन गुरु" की पंक्ति में अग्रस्थान देती है उसी प्रकार नीति तैयार करने में उनकी दूरदर्शिता उन्हें आज के नीति निर्माताओं से भी कहीं आग ले जाती है| मराठी में सही कहा है - "जाहले बहु , होतील बहु, परी या सम हाच।“ (कितने ही लोग आएँ-जाएँ, शिवाजी महाराज अद्वितीय ही रहेंगे)
 
संदर्भ उदाहरण और उद्धरण:
एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसरों श्री सुमंत टेकाडे और सुश्री रिचा जोसेफ द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज और आज की स्थानीय कंपनियों की मानव संसाधन प्रबंधन नीतियों के तुलनात्मक विश्लेषण का अभ्यासपत्र
शिवाजी – आधुनिक युव एवं सुशासन – ओर्गनायझर