शिवाजीमहाराज का भाषा व संस्कृति मंत्रालय
   

 
शिवाजीमहाराज ने राज्य व्यवहार में भाषा को विशेष महत्त्व दिया | राज्य संचालन में अपभ्रंशित व मिश्रित शब्दों के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ मराठी शब्दों का चयन किया, उनका प्रयोग प्रारंभ करवाया और प्रयत्नपूर्वक उन्हें राज्य व्यवहार में स्थापित किया | स्वराज्य की शासन व्यवस्था के लिए उन्होंने १४०० शब्दों का कोष बनाया था | चयनित शब्दों को नाम दिया गया “राज्य व्यवहार कोश” | 
 
शिवाजीमहाराज के अष्टप्रधान मंडल में पंत सचिव/ सुरनवीस नाम से एक मंत्री नियुक्त किए जाते थे | सुरनवीस अन्य राज्यों/देशो से पत्र व्यवहार करना, आवक जावक के पत्रों के निराकरण हेतु योग्य व्यक्तियों तक पहुँचाना यह कार्य करते थे |
 
 
पंत सचिव/ सुरनवीस 
'सुरनवीस’ फारसी शब्द हैI इसका कार्य महाराजद्वारा निर्देशित सभी प्रकार के पत्र व्यवहार, अधिकार-पत्र व स्वीकृति पत्रों पर मुहर लगाकर उसका लेखा जोखा रखना था| सन् १६६५ में शिवाजीमहाराज ने नीलकंठ सोनदेव को पंत सचिव नियुक्त किया | महाराज ने राज्याभिषेक के समय इस पद पर अण्णाजी दत्तो की नियुक्ति की | शिवाजी महाराज की अनुमति से अन्य राज्यों/देशो से पत्र व्यवहार करना, आवक जावक के पत्रों के निराकरण हेतु योग्य व्यक्तियों तक पहुँचाना, आवक में प्राप्त महत्वपूर्ण पत्रों एवं संदेशों से महाराज को अवगत रखना, जावक के लिए तैयार होने पर पत्र के पृष्ठ भाग में ‘बार’ शब्द लिखने का सचिव को अधिकार थाI इसका अर्थ होता था कि अब यह पत्र भेजे जाने के योग्य है |
 
 
शिवाजीमहाराज ने स्वराज की स्थापना के साथ ही दुर्गों के पुराने नाम बदलकर नए संस्कृत नाम रखे; जैसे रायरी का रायगड, साकण का संग्राम दुर्ग, रोहिडा का विचित्रगड, तोरणा का प्रचंडगड और पट्टा का विश्रामगड इत्यादि| इसी तरह आज आवश्यकता है की शिवाजीमहाराज की तरह भाषा, साहित्य, संस्कृति व सांस्कृतिक मूल्यों को शासन एवं प्रशासन में स्थापित करने की, जिससे कि स्वराज्य का मन्त्र सिद्ध हो सके|
 
 
संदर्भिका : शिवाजी व सुराज – अनिल माधव दवे.