सूरत शहर पर शिवाजी महाराज का दूसरा आक्रमण
   

सूरत शहर पर शिवाजीमहाराज का दूसरा आक्रमण 

 
राजनीतिक परिस्थिति :

मुग़लों के सबसे महत्वपूर्ण वाणिज्य केंद्र पर पहले हमले के बाद शिवाजीमहाराज ने मराठा साम्राज्य और स्वराज के लिए मुग़ल राज्य के क्षेत्रों और हिंद महासागर में उनके जहाज़ों पर अचानक हमला करना या छापे मारना जारी रखा| इससे पहले की ताक में बैठा दुश्मन हमला करे, बचाव में खुद ही दुश्मन पर हमला बोल देना उनकी रणनीति थी| सूरत पर शिवाजी महाराज के पहले हमले में मुग़लों की हार से आहत औरंगजेब ने मिर्ज़ाराजा जयसिंह को मराठों पर हमले के लिए भेजा| मिर्ज़ा ने कई मराठा क़िलों पर कब्ज़ा करते हुए ऐसा शिकंजा कस लिया की शिवाजी महाराज को अपने दुर्गों और सेना की क्षति रोकने के लिए मिर्ज़ाराजा जयसिंह के जरिए औरंगज़ेब से समझौता करना पड़ा| पुरंदर क़िले पर जयसिंह के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए शिवाजी महाराज ने अपने २३ दुर्ग और ४००,००० रुपए का मुआवज़ा मुग़लों को सौंप दिया| इतिहास में १६६५ का यह अध्याय “पुरंदर की संधि” के नाम से जाना जाता है| इसी समय मिर्ज़ाराजा जयसिंह ने शिवाजीमहाराज को औरंगज़ेब की तरफ से वार्तालाप के लिए आगरा  आने का न्योता दिया| आगरा के राजदरबार में शिवाजीमहाराज को अपमानित भी किया गया और फिर क़ैद भी| इस क़ैद से बच निकलने और राजगड पर लौटने के बाद शिवाजीमहाराज अपनी सरकार और उसकी नीतियों को फिर से संगठित करने में, अपने दुर्गों की मरम्मत और उनके प्रावधान में, तथा अपनी शक्ति को पुनर्गठित करने में लग गए| अपने हारे हुए दुर्गों पर फिर एक बार विजय प्राप्त करने के लिए वे कमर कसकर तैयार हो गए|

 

सूरत पर दूसरे आक्रमण का कारण:

मुग़लों ने जब भी कभी किसी पर हमले किए तो गाँवों, कस्बों और घरों को बुरी तरह तहस नहस कर दिया| खेत और फ़सलें जलाई गईं और लोगों पर भी अत्याचार करते हुए उन्हें मारा गया| शाइस्ता खान की चढ़ाई के दौरान भी अपनी प्रजा की कभी न भर आने वाली हानी को देखते हुए ही शिवाजीमहाराज ने सूरत को पहली बार लूटा था| १६६५ के जय सिंह के हमले के बाद भी मराठा साम्राज्य की स्थिति फिर एक बार बहुत ख़राब हो गई थी| सामान्य और गरीब लोगों पर अत्याचार करने वाली मुग़ल सल्तनत को सबक सिखाने के लिए शिवाजीमहाराज ने नई रणनीति के तहत सूरत की अपनी दूसरी लूट की योजना बनाई|

 

सूरत पर वास्तविक आक्रमण:

इस बार और भी अधिक शक्तिशाली सेना और अश्वदल के साथ (लगभग १०,००० से भी अधिक सैनिक और अश्व) शिवाजीमहाराज ने सूरत पर हमला बोल दिया| अपने पहले हमले ही की तरह इस बार भी वे कल्याण के मार्ग से ही सूरत पहुँचे| अक्तूबर १६७० को उन्होंने सूरत पर कब्ज़ा करते हुए शहर में लूट शुरू कर दी| इस लूट से कुछ अंग्रेजी, डच और फ्रांसीसी घर और सराय बच गए| फ्रांसीसियों ने मराठा सेना के साथ शांति से संधि कर ली और अंग्रेज़ों पर कब्ज़ा पाना मुश्किल प्रतीत होते देख मराठों ने उसे भी समझौता कर लिया| मुग़लों के ज्यादातर अधिकारी शहर से भाग खड़े हुए थे इसी कारण शहर में मुग़लों का प्रतिरोध कम रहा| इस लूट का मुख्य उद्देश्य कम से कम समय में अधिक से अधिकतम धन इकठ्ठा करना था इसलिए मराठा सेना ने शहर के समृद्ध व्यापारियों को लूटा पर्याप्त लूट जमा करने के बाद सूरत के क़िले पर कब्ज़ा करने की धमकी देते हुए शिवाजीमहाराज ने ५ अक्तूबर १६७० को मुग़ल अधिकारीयों को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा जिसमे उन्होंने सालाना बारह लाख रुपए का हर्ज़ाना माँगा और इस माँग के नामंजूर होने की सूरत में फिर एक और लूट की धमकी भी दी|

शिवाजीमहाराज की इस लूट के दौरान अधिकांश विदेशी व्यापारियों और मुग़ल अधिकारीयों ने स्वाली बंदरगाह के पास शरण ले ली थी| यहाँ अंग्रेजों, डच और फ्रांसीसियों के बड़े गोदाम भी थे| मगर बसंत में नदी में आए बड़े ज्वार के कारण मराठा सेना नदी पार करने में असमर्थ रही और स्वाली बंदरगाह सुरक्षित रहा| जहाँ पहले हमले की लूट करीबन ८० लाख रुपए रही वहीँ इस दूसरे हमले में लगभग ६६ लाख की राशी लूटी गई| इस हमले से शिवाजीमहाराज ने विश्व भर में यह संदेश प्रस्थापित किया कि यदि कोई उनकी मातृभूमि को क्षति पहुँचाए तो वह दुगनी शक्ति से आक्रमण करने की क्षमता रखते हैं| केवल राष्ट्र भाव और राष्ट्र सुरक्षा के हेतु से ही आक्रमण करने वाले शिवाजीमहाराज की महानता उल्लेखनीय है|

स्वामी विवेकानंद शिवाजीमहाराज के बारे में कहते हैं कि – “शिवाजीमहाराज एक ऐसे महान व्यक्तित्व हैं जिन्होंने हमारे धर्म और समाज का विनाश होने से बचाया है| पुराणों में महापुरुषों के लिए बताए गए सभी गुणों से संपन्न महानायक, ईश्वर की सत्ता को मानने वाला पवित्र राजा यदि कोई हुआ है तो वो शिवाजीमहाराज ही हैं| महाराज हमेशा ही राष्ट्र आत्मा का प्रतीक और भविष्य के लिए रौशनी की किरण रहे हैं|”

हर साँस में स्वराज के स्वप्न को जीनेवाला ऐसा नायक इतिहास नित्य उत्पन्न नहीं करता| न्यायप्रिय, लोकप्रिय और सदाचारी राजा के रूप में इतिहास और आने वाली कई सदियाँ सदैव उनका स्मरण करेंगी|