सूरत शहर पर शिवाजी महाराज का पहला आक्रमण

 
सूरत शहर पर शिवाजी महाराज का पहला आक्रमण
 
राजनीतिक परिस्थिति : मुग़लिया सल्तनत की शुरुवात पंद्रहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के आखिरी शासक इब्राहीम लोदी पर बाबर की जीत से हुई| १५२६ का यह युद्ध इतिहास में पानीपत के पहले युद्ध के नाम से जाना जाता है| बाबर से हुमायूँ और फिर आगे अकबर तक सभी मुग़ल बादशाहों ने अपने क्षेत्र में आर्थिक विकास के साथ-साथ स्थानिक संस्कृति एवं परंपराओं में रूचि रखते हुए धार्मिक सामंजस्य भी प्रस्थापित किया|  आगे चलकर अकबर की धर्मनिरपेक्षता की विरासत को पीछे छोड़ उनके परम परपोते औरंगज़ेब ने भारत के “इस्लामीकरण” पर ज़ोर देना शुरू कर दिया और वह अपनी सल्तनत के विस्तार के लिए आक्रमण करने के इरादे से भारत के दक्षिण हिस्से की और निकल पड़ा| दक्खन में बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा, इन तीन सल्तनतों का राज था और तत्कालीन अधिकांश मराठा फौज ने किसी एक के प्रति अपनी वफ़ादारी प्रणित कर दी थी | मगर फर भी वह आक्रमकता से आपसी गठजोड़ में लगे हुए थे ताकि किसी दिन अपना अलग राज्य बना सकें|
 

“हिंदवी स्वराज” की कल्पना : स्थानीय क्षेत्रों एवं संस्थानों पर नियंत्रण रखने वाले हज़ारों शासकों में एक थे शिवाजी, मगर मुग़लों और दक्खन की सल्तनतों को उनसे खतरा प्रतीत होने का कारण था - उनकी हिंदवी स्वराज की संकल्पना| उनकी कल्पना में हिंदवी स्वराज सर्वसम्मति वाला एक ऐसा राष्ट्र होने वाला था जिसमें हर भारतीय अपने धर्म जाति और विचारधाराओं की स्वतंत्रता के साथ संयुक्त रूप से रह सके| आदिलशाह, निज़ाम और मुग़लों के साम्राज्य शक्तिशाली जरूर थे, मगर अक्सर उनके स्थानीय प्रधानों और सरदारों का अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किए जाने की वजह से आम जनता को संकट और अन्याय का सामना करना पड़ता था| इस अन्याय और निष्ठुरता से लोगों को मुक्त कराते हुए शिवाजी महाराज ने भविष्य में राजा महाराजाओं के लिए अच्छे शासन का उदाहरण सामने रखा| उनकी बहादुरी, मानसिक एवं शारीरक क्षमता, आदर्शवाद, आयोजन कौशल, सख्त और नियोजित शासन, कूटनीति, साहस, दूरदर्शिता आदि गुणों के ही कारण निज़ाम और मुग़लों के लिए वे एक चुनौती बन गए थे|

 
 

सूरत पर आक्रमण का कारण : अपनी मातृभूमि को मुग़लों और अन्य सल्तनतों के कब्ज़े से छुड़ाने के लिए तथा उसपर पुनः नियंत्रण पाने के लिए शिवाजी महाराज ने दुश्मन की हमलावर सेनाओं के विरुद्ध जंग छेड़ी थी| शिवाजी महाराज के केन्द्रित एवं  निरंतर सफल हमलों से प्रकोपित होकर औरंगज़ेब ने शाइस्ता खान को दक्खन में शिवाजी की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए भेजा| जनवरी १६६० में शाइस्ता खान ने औरंगाबाद से पुणे तक चढ़ाई करते हुए इर्द गिर्द के क्षेत्रों में काफ़ी लूट मचाई और उर्वर क्षेत्रों की फसलों का भी भारी नुकसान किया| इस लूट ने मराठा साम्राज्य को अदम्य क्षति पहुँचाई| शिवाजी महाराज के प्रतियुद्ध से बचते बचाते शाइस्ता खान तीन साल तक पुणे में रहा और आखिर हथियार डाल भाग खड़ा हुआ| मगर इस दौरान उसकी मचाई लूट और बर्बादी की वजह से मराठा साम्राज्य पर मुसीबतों और वित्तीय बोझ का पहाड़ टूट पड़ा| इस परिस्थिति को सुधारने और सुशासन का रथ फिर से रास्ते पर लाने के हेतु से शिवाजी महाराज ने सूरत पर हमला करने की योजना बनाई जो एक अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक बंदरगाह था और मुग़लों का संपन्न वाणिज्य केंद्र भी जहाँ करों के रूप में लाखों रुपए का उत्पन्न संकलित होता था|

 

सूरत पर वास्तविक आक्रमण : इससे पहले भी शिवाजी महाराज ने दौलताबाद(औरंगाबाद), खानदेश और जुन्नर को लूटा था मगर वह सभी आकस्मिक हमले थे| सूरत का हमला एक सोचा समझा योजनाबद्ध कदम था| शिवाजी महाराज हमेशा अभिनव युद्द नीतियों हो अपनाते और इसी वजह से उनके पास ख़ुफ़िया ख़बरों को ज्ञात करने वाला एक अलग दल था| सूरत के हमले से पहले उनके इसी दल ने शहर की व्यवस्था, रक्षा रणनीतियों और शत्रुसेना की क्षमता के साथ-साथ  देसी-विदेशी व्यापारियों, गोदामों, गिरिजाघरों और मिशनरियों तथा संपन्न-समृद्ध नागरिकों का पूरा अध्ययन एवं सर्वेक्षण किया था|

५ जनवरी १६६४ शिवाजी महाराज ने अपनी सेना और अश्वदल के साथ सूरत पर हमला बोल दिया| साथ में महाराज के विश्वसनीय सरदार मोरोपंत पिंगले और प्रतापराव गुजर भी थे| सूरत के मुग़ल सरदार इनायत खान ने आपसी चर्चा के बहाने शिवाजी महाराज को बुलाकर उनका वध करने की योजना बनाई| इस विश्वासघात से क्रुद्ध शिवाजी महाराज ने निष्कृतिधन (फिरौती) की माँग की मगर इनायत खान ने इसका कोई जवाब नहीं दिया| अब मराठा सेना शहर पर टूट पड़ी और महलों, कचहरियों तथा अमीरों पर छापा मारकर उन्हें लूटना शुरू कर दिया| इस लूट में न्यायशील शिवाजी महाराज ने उदार,साफ़दिल एवं दूसरों की मदद करने वाले अमीरों को बख्श दिया और साथ ही निर्धनों, महिलाओं, बच्चों पर भी कोई आँच नहीं आने दी थी| जहाँ शहर का दो तिहाई हिस्सा आक्रमण की आग में जल रहा था वहीं किसी भी धर्मिल स्थल को क्षति नहीं पहुँचाई गई थी| शिवाजी महाराज के इस व्यव्हार ने उनकी छंवी एक न्यायप्रिय और सदाचारी राजा के रूप में और भी उजागर की| इस नैतिक संहिता से उनके साम्राज्य और शत्रु साम्राज्य के व्यापारी तथा सामान्यगण भी प्रभावित हुए|

इस हमले की खबर पूरे विश्व में आग की तरह फ़ैल गई मगर साथ ही यह संदेश भी कोने-कोने में पहुँचा कि मुग़लों का प्रतिकार करते हुए अपने प्राणों की परवाह किए बिना प्रतिशोध के लिए हर मराठा कटिबद्ध है| पुणे में शाइस्ता खान की लूट के बदले में छः दिनों तक जारी रही सूरत इस लूट की सभी राशी हिंदवी स्वराज की राजधानी रायगढ़ पर पहुँचाई गई| मराठा साम्राज्य को विकसित करने और उसे और भी मज़बूत बनाने के लिए इस धनराशी का विनिमय हुआ|