शिवाजीमहाराज का आगरा से पलायन
   

 

 
शिवाजीमहाराज– मुग़लों के लिए खतरा

महाराज शिवाजीराजे भोंसले एक महान योद्धा थे जो अपने अनुशासित सैन्यदल और संरचित प्रशासनिक संगठनशक्ति के साथ-साथ अपने प्रगतिशील नागरिक शासन के लिए जाने जाते थे | भौगोलिक स्थिति का फायदा लेते हुए दुश्मनों पर शीघ्र गति से अचानक आक्रमण करने की उनकी छापामार युद्धनीति की वजह से वे उत्तर और दक्षिणी भारत पर राज करने वाले मुग़लों और निज़ाम के लिए बड़ा खतरा बन गए थे | इस महान दूरदर्शी और निष्पक्ष राजा के लिए “स्वराज” की स्थापना एक ऐसा सपना था जिसे वास्तव में ले आने के लिए वे कुछ भी कर सकते थे| अपनी मातृभूमि के लोगों को वो शांतिमय जीवन जीने का मौका देना चाहते थे जो मुग़लों और निज़ाम के शासन में असंभव था | 

दक्खन में शिवाजीमहाराज की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए और उनपर लगातार दबाव डालने के प्रयास हेतु मुग़ल सरदार शाइस्ताखान में मराठों पर आक्रमण किया | परंतु पुणे में शाइस्ताखान की जबरदस्त हार के बाद गुस्से से मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने शिवाजीमहाराज को हराने के लिए १६६४ में महाराजा मिर्झाराजे जयसिंह के नेतृत्व में १०,००० सैनिकों की एक और बड़ी सेना भेजी | जय सिंह की सेना ने पुरंदर के क़िले को घेर लिया जहाँ उस वक्त शिवाजीमहाराज ने अपना शिविर बसाया था| संघर्ष विराम हेतु समझौते के अलावा शिवाजीमहाराज के पास अन्य कोई चारा नहीं था | एक शांति संधि के तहत शिवाजीमहाराज ने अपने द्वारा नियंत्रित ३५ क़िलों में से २३ मुग़लों को सौंपने की सहमती दर्शाई | जय सिंह ने उन्हें यह सलाह दी कि संधि पर हस्ताक्षर और मंजूरी के लिए शिवाजीमहाराज मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब से मिलने आगरा आएँ |
 

शिवाजीमहाराज – आगरा में

शिवाजीमहाराज को महाराजा जय सिंह और स्वयं औरंगज़ेब ने उनके शाही रुतबे के अनुसार मान सम्मान का आश्वासन दिया था| तद्नुसार, शिवाजीमहाराज अपने पुत्र संभाजी और अन्य विश्वस्तों के छोटे से दल के साथ ११ मई १६६६ को आगरा पहुँचे| जैसा कि महाराजा जय सिंह ने वादा किया था, उनके पुत्र राम सिंह ने शिवाजीमहाराज का स्वागत किया| लेकिन जब उन्हें शाही दरबार में ले जाया गया तो आश्चर्य की बात थी कि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने उनकी ओर देखा तक नहीं| उन्हें दरबारियों की तीसरी पंक्ति में खड़ा किया गया जो राजा के रूप में उनके रुतबे का अपमान था | शिवाजीमहाराज  इस अपमान से नाराज़ हुए और गुस्से में अपनी असहमति प्रदर्शित करते हुए दरबार छोड़ कर चले गए|

उनकी इस धृष्टता के जवाब में औरंगज़ेब ने उन्हें शाही विश्रामगृह में नजरकैद करके रख लिया | हाँलाकि शिवाजीमहाराज के अनुरोध पर उनके सहयोगियों को रिहा किया गया मगर बाद में न तो बादशाह ने उनसे कोई और चर्चा की और न ही अगले कुछ महीनों तक आगरा छोड़ने की अनुमति दी | तीन महीने गुज़र गए मगर यह स्थिति जरा भी नहीं बदली | शिवाजीमहाराज को यह एहसास हो गया कि यही वह वक्त है जब इस कैद से निकल भागने की कोई योजना बनानी पड़ेगी|

 

आगरा से पलायन

वह अगस्त का महिना था जब शिवाजीमहाराज ने तीव्र पेट दर्द की शिकायत की | उनके इलाज के लिए वैद हकीमों को बुलाया गया | तीन चार दिन के उपचार के बाद उन्होंने तबियत में सुधार महसूस होने की बात की | स्वास्थ्य सुधार के उपलक्ष उन्होंने वैद हकीमों का शुक्रिया अदा करते हुए माँ भवानी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और तथा गरीबों में धन और मिठाईयों की खैरात बांटने की इच्छा व्यक्त की | उनकी इस इच्छा का मान रखते हुए राम सिंह ने विश्रामगृह में ही भारी मात्रा में मिठाई बनाने का इंतज़ाम किया | प्रतिदिन फल – मिठाईयों की दो बड़ी टोकरियाँ गरीबों में वितरित होने के लिए विश्रामगृह से बाहर जाने लगीं| रोज विश्रामगृह के रक्षक फाटक पर टोकरियों की जाँच करते मगर जैसे जैसे यह रोज का नियमित कार्य होने लगा जाँच अनियंत्रित और शिथिल पड़ती गई | चतुर शिवाजीमहाराज इसी मौके का इंतज़ार कर रहे थे | १७ अगस्त १६६६ के दिन शिवाजीमहाराज और उनके पुत्र संभाजी इन्ही टोकरियों में बैठकर कैद से भाग निकले | सेवकों को गुमराह करने के लिए शिवाजीराजे के दो साथी शिवाजीमहाराज और बाल संभाजीराजे  का भेस लेकर विश्रामगृह में रहे मगर उनका यह छल पकड़ा जाने तक शिवाजीमहाराज पुत्र संभाजी के साथ उत्तर में मथुरा की तरफ़ निकल चुके थे | वे जानते थे कि सतर्क होने के बाद मुग़ल सेना उन्हें ढूँढने दक्षिण में दक्खन की ओर भागेगी इसीलिए उन्होंने उत्तर में मथुरा में जाने की सोची| वहाँ एक विश्वसनीय सहयोगी की देख रेख में संभाजीराजे  को छोड़कर अपनी दाढ़ी मूंछें मुंडवाकर, भेस बदलकर उन्होंने मथुरा छोड़ी| प्रयाग, बुंदेलखंड और गोलकोंडा की यात्रा करते हुए वे सुरक्षित रूप से राजगड पर पहुँच गए | माना जाता है कि इस पलायन में राम सिंह ने उनका साथ दिया था और बावजूद इसके कि ऐसा कोई भी आरोप उनपर सिद्ध न हो सका, मुग़ल बादशाह ने दरबार में राम सिंह की पदावनति कर दी थी |

सितंबर १६६६ में शिवाजीराजे राजगड  पहुंचे और उन्होंने अपने आप को अपनी सरकार और उसकी नीतियों को पुनः संगठित करने, क़िलों की मरम्मत करने में और अपनी सैन्य शक्ति को सुधारने में लगा दिया | अपने हारे हुए क़िलों और क्षेत्रों की पुनः विजय प्राप्ति करते हुए आठ साल बाद ६ जून १६७४ को शिवाजीमहाराज का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक हुआ |