शिवसृष्टी का निर्माण
 
 
 
 
किसी भी राष्ट्र को अधिक महान बनाने के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी सभी ने राष्ट्रीय चरित्र को विकसित करने में योगदान देना जरूरी होता है| यह तभी संभव है जब युवाओं में आदर्श नीति मूल्यों की पहचान और उनके प्रति आस्था हो| इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो गुण और दोष की सीख से भरी कई कहानियाँ मिलेंगी, जिनसे समूचे विश्व में राष्ट्र को – भारत को, एक समृद्ध, मजबूत तथा स्वाभिमान से सर सदैव ऊँचा रखने वाले देश के रूप में आगे ले जाने की आवश्यक दिशा, प्रोत्साहन एवं प्रेरणा हमें प्राप्त होती रहेगी | छत्रपति शिवाजी महाराज – भारत के इतिहास के एक ऐसे ही महान योद्धा, जिनकी रणनीति के साथ साथ उनकी दृष्टि, वीरता, गुण और ज्ञान के किस्से सदियों बाद भी आज की पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणास्रोत हैं| महाराजा शिवछत्रपति प्रतिष्ठान का गठन शिवाजी महाराज का आदर्श सामने रखते हुए, उनके जीवनकाल से जुड़े किस्से कहानियों और सत्य का जतन करते हुए देश ही में नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में उनकी प्रसिद्धि, प्रचार और प्रेरक परिवर्तन के उद्देश्य से हुआ है|
 
 
प्रतिष्ठान के संस्थापक श्री. बळवंत मोरेश्वर पुरंदरे जिन्हें दुनिया बाबासाहेब पुरंदरे के नाम से जानती है, शायद आज के युग में शिवाजी महाराज के सबसे बड़े भक्त रहे हैं| १९७४ में, शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक की तीसरी शताब्दी (तीन सौ साल) पूरी हुई | इस ऐतिहासिक घटना को अंकित करते हुए बाबासाहेब की अध्यक्षता में प्रतिष्ठान ने मुंबई के शिवाजी पार्क में एक बहु आयामी प्रदर्शनी के रूप में भव्य समारोह का आयोजन किया|
 
 
इस परियोजना को नाम दिया गया – “शिवसृष्टि” जो शिवाजी महाराज के जीवनकाल में अनन्यसाधारण महत्व रखने वाली वास्तुओं और वस्तुओं का प्रतीकात्मक रूप था| इस प्रदर्शनी में माँ भवानी का मंदिर था तो सिंहगढ़ का क़िला भी, रायगढ़ के बुर्ज़ भी थे और दुर्लभ प्राचीन वस्तुएँ, हथियार और सिक्के भी| प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण रही तो शिवाजी महाराज की प्रसिद्ध तलवार – “भवानी तलवार” जिसे अत्यंत सावधानी से सातारा के रॉयल पैलेस से मुंबई लाया गया था |
 
 
प्रदर्शनी का प्रवेशद्वार भव्य असल-कद हाथियों के पुतलों से सजा था जिससे आगंतुकों को लगे मानो वो सच में शिवाजी महाराज के ही किसी गढ़ में प्रवेश कर रहे हैं | दूसरा आकर्षण था बाईस मिनट की संगीत नाटिका जो शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक को दर्शाती थी | लगभग सौ से अधिक कलाकारों की इस नाटिका को स्वयं बाबासाहेब ने रचा था |
प्रदर्शनी का प्रभाव जनमानस पर खूब पड़ा, मगर उसी समय हुई रेल्वे की व्यापक हड़ताल ने इस प्रदर्शनी में विघ्न डाल दिया | उस वक्त तो समारोह बंद हुआ मगर इस समृद्ध अनुभव ने बाबासाहेब को आगे चलकर तीन घंटे के महानाटक “जाणता राजा” लिखने के लिए प्रोत्साहित किया | देश विदेश में आज तक इसके अस्सी लाख से भी ज्यादा दर्शक रह चुके हैं | “जाणता राजा” छत्रपति शिवाजी महाराज की कहानी को लोगों तक ले जाने वाला एक माध्यम रहा मगर महाराजा शिवछत्रपति प्रतिष्ठान का मूलमंत्र आज भी वही है| प्रतिष्ठान मराठा साम्राज्य की भव्यता और गौरव के अनुभव को वास्तव में साध्य करने के हेतु से एक विराट धरोहर स्थल - “शिवसृष्टि” का निर्माण कर रहा है, जो मराठा साम्राज्य की महिमा को बखूबी प्रतिबिंबित करेगा| इसकी रचना में परंपरा और विरासत का पूरा ध्यान रखा जा रहा है | “शिवसृष्टि” छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास को देश के घर-घर में ले जानेका प्रयास है जिससे हम सभी इस महान अनुकरणीय शासक, सक्षम प्रशासक और दूरदर्शी व्यक्तित्व को और करीब से जान सकें और उनका अनुगमन कर सकें और नव राष्ट्र निर्माण में सहायक हो सकें|